हमारे दुःख का मुख्य कारण स्वयं की आवश्यकता नहीं बल्कि हम अपनों का और दूसरे लोगो का मूल्याकंन करना, उनकी बुराई, आलोचना, निन्दा एवं ईर्ष्या में लीन रहना होता है और बेमतलब अपनों से जुड़े लोगो की चर्चा करते रहना …
ईर्ष्या व द्वेष करने वाला इन्सान ही दुःखी रहता है और बेवजह स्वयं का जीवन खराब कर लेता है


